नफ़ीस लबों और फ़रोज़ाँ आरिज़ों को देख लगता था
कि सारे आलम में ज़मीन ढूंढते धूप के रक़्स
आख़िरकार पनाह पा गए हों उसके चेहरे पर
एक ही चेहरे से कह दी गयी थी ग़ज़लें
उदासी और खुशमिज़ाजी की
एक ही चेहरे के वरक़ पर लिखी थीं
इबारतें ग़मे-फ़िराक़ और सुकूने-विसाल की
वो कुछ तलाशती थी या नापती थी दूरियाँ
ख़ुद से उसकी जिसकी कि उसे तलाश रही होगी
मुझसे उसे कुछ ऐसी उम्मीद थी
कि हँसते मौसमों में समझ जाऊँ ख़िज़ाँ की आहट
देख लूँ उन पानी के से धब्बों को
जो उसके रुख़सारों के गड्ढों में छुपे हैं
उसकी हँसी में भी उलझन थी
उसके ग़म समझना भी मुश्किल था
मैं शायद कुछ मुक़र्रर कह पाता उसके बारे में
काश ! उसकी आँखें भी देख पाता....
I m speechless!:)
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