Saturday, May 19, 2012

स्वीपर ख़ुशबू





हर एक-दो रोज़ बाद
मेरे घर आया करती है ख़ुशबू


ये एक अपाहिजों का घर है
यानि !  इसमें हम जो सब रहते हैं
अपाहिज हैं


ख़ुशबू के पास दो चीज़ें होती हैं
सींकों वाली झाङू और बेमोल तबस्सुम
झाङू इसलिए कि हम अपाहिज हैं
तबस्सुम इसलिए कि ठीक बात नहीं
अपाहिज को अपाहिज कहना..


10 मिनट में वो सब ठीक कर देती है
चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न
क्या हुनर है !!
घर के सामने की नाली से 
बहा ले जाती है हमारे जिस्मों का मैल
जिसके बारे में एक पुख़्तगी लेकर हम बाथरूम से निकलते हैं
कि छुड़ा लिया होगा। 


ख़ुशबू इतनी ज़िंदा, कि चार इंच ऊपर से
फेंकी गयी दो रोटियों से निचोड़ लेती है
विटामिन्स मिनरल्स यू नो !! एवरीथिंग.
और हम अपाहिज इतने अपाहिज
कि उसे छू भी नहीं पाते हैं


ख़ुशबू जो पाँच-छह रोज़ न आ पाये हमारे यहाँ
तो घर के कुछ बेहद अहम हिस्से
सड़ांध मारने लगते हैं...



Saturday, April 28, 2012

ग़ज़ल




फ़स्ल-ए-गुल, पर अदा नहीं,
इश्क़ घिरा है बरसा नहीं.


लुत्फ़ जो इंतज़ार में ठहरा 
वस्ल में वो मज़ा नहीं.


सूरज से रंजिश भी ली है
और बादल से याराना नहीं.


शब ये मुझसे कटती नहीं
दिन कमबख़्त गुज़रता नहीं.


समंदर ने मुझको खूब पुकारा 
झील ने कहा कहीं जाना नहीं.


मंज़िल है के कूचा-ए-अजनबी
ये दुनिया मेरी दुनिया नहीं.




Wednesday, March 07, 2012

एक ही दरख़्त है इस सेहरा में


हम दोनों के दरमयाँ
एक गहरी तेज़ बहाव वाली
नदी बहती है
ये नदी ख़ाबख़ोर मगरमच्छों से भरी है
ये मगरमच्छ तुम्हारे मेरे ख़ौफ़ से पैदा हुये हैं


हम दोनों एक अजीब क़ैफ़ियत के शिकार हैं
हमने पाले हैं दो दुश्मन जज़्बात एक साथ
एक मुहब्बत दूसरा ख़ौफ़
इन दोनों के साथ जीना 
हम सीख भी नहीं पाये हैं
और जी भी रहे हैं


तुम्हारे उधर के मंज़र ख़ूबसूरत हैं
रुत मेरे इधर भी खराब नहीं है
पार तुम भी आना चाहते हो
पार मैं भी जाना चाहता हूँ


उफ़्फ़ ये क्यूँ नहीं होता
ख़ौफ़ मुहब्बत को खा जाता
या ख़ुद फना हो जाता उसकी तासीर से
ये किस हाल में जी रहें हैं हम दोनों


सच कहूँ, एक ही दरख़्त है इस सेहरा में
जिसकी छाँव में मैं नींद ले पाता हूँ,
वो ये कि इस तरफ़ से तुम उस किनारे पर
साफ़-साफ़ दिखाई देते हो.


Wednesday, November 30, 2011

यादों की सड़क - घर तक


ये तारों का एक गुच्छा
जो यहाँ की मुंडेर से दिखता है
वहाँ के आसमान में भी हू-ब-हू टिका है
उस के ठीक नीचे
रस्ते पर आँख लगाए खड़ा है
मेरी पैदाइश के पहले का
छत पर का कमरा मेरा

उस कमरे में सामान बहुत ज़्यादा नहीं है
एक पुलिंदा किताबें और एक बिस्तर है
कुछ काग़ज़ के पुर्ज़े और कुछ
टूटी फूटी नज़्मों की रूहें हैं
अधकचरे अफ़सानों की अजन्मी लाशें भी मिल जायेंगी 
जो अब इंतज़ार नहीं करतीं
ख़ुद में जान फूँके जाने का

एक क़लम ज़रूर होगी
मेरी उडीक की स्याही अपने में समेटे हुए ,
कमरे के हर कोने में
मेरी साँसों के निशान पसरे हैं
मेरे आँसुओं की भाप मौजूद है
उन्हीं की कीमियाई से ज़िन्दा रखे होगी
अपने भीतर के पानी को

अब भी उन दरीचों से छनकर आती होगी
गली में खेलते बच्चों की आवाज़ें
कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें
कभी कभार किसी गुज़रती मोटर की आवाज़
और पड़ोस के धोबी की
कपड़ों  को पछाड़ने की आवाज़
उड़ती पतंगों की सरसराहट
वो-कटा वो-मारा की आवाज़
पाँच दफ़े की अज़ान
और मंदिर के घंटों की आवाज़ 

तुम्हें पता है
मैं कहीं भी जाता हूँ थोडा ही जा पाता हूँ 
बहुत सारा तो वहीं रह जाता हूँ
कमरे में अपने

हर रात यहाँ के आसमान से कहता हूँ
वहाँ की छत से भी दिखता है
हू-ब-हू ऐसा ही एक तारों का गुच्छा ..!


Friday, September 30, 2011

सराब



मैं बहुत दूर चला 
क्षितिज पर ख़ुशनुमा मौसमों का मंज़र दिखता था,
लुभाता था इतना के मैं बावजूद थकने के
चलता ही रहता था
ऊबड़-ख़ाबड़ रास्तों और तंग तलहटियों से होकर
बड़ी मुश्किल से पहुँचा
पौंछकर पसीना, धोकर आँखें, साँस का एक घूँट लेकर,
देखा !! कुछ नहीं था,
सिर्फ़ धुँआ था....धुँआ !!
एक आख़िरी कोशिश की हिम्मत जुटाकर
एक गड्ढा खोदा
उसमें खोंस कर अपना सिर हाथों से
मिट्टी बुरकाने लगा,
एक ही लहज़े में समझ गया
के ये भी उतना आसान नहीं है
जितना मैंने समझा था
एक अधकचरी चीख़ के साथ ही मैंने
मुड़कर पीछे देखा 
उस रास्ते के पार की जगह को
जहाँ से मैं लश्कर लेके चला था
फिर से क्षितिज पर नाच रहे थे
चिढ़ा भी रहे थे, ख़ुशनुमा मौसमों के मंज़र
मुझे लगा, मैं बहुत दूर निकल आया हूँ। 


Thursday, September 22, 2011

सलोनी





नफ़ीस लबों और फ़रोज़ाँ आरिज़ों को देख लगता था
कि सारे आलम में ज़मीन ढूंढते धूप के रक़्स
आख़िरकार पनाह पा गए हों उसके चेहरे पर
एक ही चेहरे से कह दी गयी थी ग़ज़लें
उदासी और खुशमिज़ाजी की
एक ही चेहरे के वरक़ पर लिखी थीं
इबारतें ग़मे-फ़िराक़ और सुकूने-विसाल की
वो कुछ तलाशती थी या नापती थी दूरियाँ
ख़ुद से उसकी जिसकी कि उसे तलाश रही होगी

मुझसे उसे कुछ ऐसी उम्मीद थी
कि हँसते मौसमों में समझ जाऊँ ख़िज़ाँ की आहट
देख लूँ उन पानी के से धब्बों को
जो उसके रुख़सारों के गड्ढों में छुपे हैं
उसकी हँसी में भी उलझन थी
उसके ग़म समझना भी मुश्किल था

मैं शायद कुछ मुक़र्रर कह पाता उसके बारे में
काश ! उसकी आँखें भी देख पाता....

Tuesday, September 13, 2011

हर नफ़स आज़ादी-आज़ादी..


"फ़लाँ साहब के लड़के ने तुम्हारी ही कॉलेज से engineering किया है, अब फ़लाँ कंपनी में काम कर रहा है, और "इतना" उसका पैकेज है.." , इस तरह के जुमलों के परबत अब इतने रगड़ खा चुके हैं के भारी बादलों को इस पार नहीं रोक पाते हैं, और पानी से भरे बादल आसानी से उन्हें लांघ लेते हैं। ग़ौरतलब है के ऐसे जुमले मेरे दादा और पिता के उस अरसे से तकिया क़लाम हैं जब से मैंने engineering से छुटकारा पाया है। अब तो हाल ये है के उनके मुँह से भी ये धीरे-धीरे उतरने लगे हैं, और वे अपनी कालजयी नीति को लगभग अधमरा मान चुके हैं जिसके तहत उनका कभी सोचना रहा होगा, "तब तक बेइज़्ज़त करो जब तक औलाद आपकी बात न मान ले..." 
हालांकि हार मानने वालों में से वो नहीं है, बस नीति-परिवर्तन का दौर शुरू किया है। अब जा-ब-जा मेरी चुगलियाँ होती हैं, मेरी दिनचर्या भीषण आलोचना की शिकार है, तंज़-ओ-तानों के भयानक दौर शुरू हो गए हैं, और वो सभी क़वायदें की जा रही हैं कि किसी तरह तो मैं अपनी महा-मूर्खता को पहचानूँ और ज़िंदगी के तौर घर के रणविजयों के मुताबिक़ ढाल लूँ। ये तो वो है जो सामने कि दिखती बात है, अलावा इसके, कभी-कभार घर के दर-ओ-दीवारों को जो बातें करते मैंने सुना है वो इस तरह हैं, "26 का हो गया है, अब तक तो कोई जात-भाई पूछता तक नहीं है, न जाने कौन इसे लड़की देगा अपनी, कहीं ऐसा न हो के छोटे को पहले ब्याहना पड़े.."; और, "पता नहीं दिन भर घर में पड़े-पड़े क्या करता रहता है, दुकान पर कितना भी हमारा हाथ अड़ जाये, लेकिन ऐसा तो है ही नहीं के इसे बुला लिया जाये, दो काम करने जैसा भी नहीं है, होया-अनहोया है,..", और, "दिन भर जाने क्या किताबें पढ़ता रहता है, कॉलेज के दिनों में तो कभी पढ़ते हुए नहीं देखा, पढ़ाई की होती तो आज ये नौबत थोड़े आती.." और भी न जाने क्या क्या..कभी कभी मैं दीवारों को कह देता हूँ, के भई मुझे न बताया करो ये सब, अब कुछ ऐसा हो जो न-मालूम हो तो कहो भी, ये तो बहुत पुराना है...जैसे सदियों से ही चला आ रहा हो... 
कभी-कभी मुझे ख़ाब भी देखिये कैसे आते हैं, कोई शेरवानी पहने साहिब, दिखने में नीम-अदीब से लगते हैं, माइक पर एक निहायत सलीकेदार जनता से मुखातिब हो मेरे नाम के साथ ऐलान कर रहे हैं के इनके फ़लाँ लेख के लिए इन्हें "इतने लाख" रुपयों इनाम से नवाज़ा जाता है, इस उम्मीद के साथ के ये हमेशा इसी तरह लिखते रहें,..वगैरह-वगैरह..सामने कि क़तारों की कुछ सीटों पर मैं मेरे परिवार वालों के साथ तशरीफ़ज़दा हूँ, और ऐलान के साथ ही स्टेज पे जाकर अपना इनाम जेब में रखता हूँ, और घर वालों का आशीर्वाद लेता हूँ। अब तो भाई सारे मुहल्ले में, मुहल्ले में क्या सारे शहर में चर्चा है, कहीं दादा के होनहार पोते का, कहीं बाप के क़ाबिल सपूत का..दादा बयान करते नहीं थक रहें हैं। "क्या कहें साहब आपको ! दिन भर किताबों में सिर धुनता रहता था, हमको भी कभी नहीं बताया के क्या कर रहा है, नौकरी नहीं की तो गालियाँ भी कम नहीं दी इसे, हम क्या समझते थे के ये तो हीरा है, देखो जी ! ये लिखने-विखने के भी इतने पैसे मिलते हैं कभी ? पर पोते का जवाब नहीं..." और....  

ख़ैर ! सपना है , कुछ भी दिख जाता है...ऐसे सपनों के बाद मैं बहुत देर तक अपनी मुस्कान पे लाठी नहीं मार पाता हूँ। मगर सच ये है के मेरे किए गए इंतेख़ाबों से कोई खुश नहीं है। सभी सिर धुन रहें हैं के लायक हो तो एक ही बहुत..मेरा दमित बचपन अब तक गालियाँ देता है। और अब फ़ालतू सी उम्मीदों के पहाड़ मेरे कंधों पे लादे जा रहें हैं...मगर किसी तरह मैं "आबरू" बचाए बैठा हूँ। ज़ोर मार रहा हूँ वही करने के लिए जो मैं करना चाहता हूँ। मेरे परिवार वाले मुझसे होने वाले किसी ऐसे काम की अब सारी उम्मीदें  छोड़ चुके हैं जिससे उन्हें मुझ पर गर्व हो। उनके मुताबिक़ ऐसी "क़लम घसीटू", नाकारा औलाद से उम्मीद ही क्या की जा सकती है.।
वैसे उनका मेरी तरफ़ से ना-उम्मीद होना एक तरह से अच्छा ही है...सोच को कौन पाबंद कर सकता है? ये ना-उम्मीदी मेरे लिए कुछ ऐसी है, जैसे हर नफ़स आज़ादी-आज़ादी..