Friday, September 30, 2011

सराब



मैं बहुत दूर चला 
क्षितिज पर ख़ुशनुमा मौसमों का मंज़र दिखता था,
लुभाता था इतना के मैं बावजूद थकने के
चलता ही रहता था
ऊबड़-ख़ाबड़ रास्तों और तंग तलहटियों से होकर
बड़ी मुश्किल से पहुँचा
पौंछकर पसीना, धोकर आँखें, साँस का एक घूँट लेकर,
देखा !! कुछ नहीं था,
सिर्फ़ धुँआ था....धुँआ !!
एक आख़िरी कोशिश की हिम्मत जुटाकर
एक गड्ढा खोदा
उसमें खोंस कर अपना सिर हाथों से
मिट्टी बुरकाने लगा,
एक ही लहज़े में समझ गया
के ये भी उतना आसान नहीं है
जितना मैंने समझा था
एक अधकचरी चीख़ के साथ ही मैंने
मुड़कर पीछे देखा 
उस रास्ते के पार की जगह को
जहाँ से मैं लश्कर लेके चला था
फिर से क्षितिज पर नाच रहे थे
चिढ़ा भी रहे थे, ख़ुशनुमा मौसमों के मंज़र
मुझे लगा, मैं बहुत दूर निकल आया हूँ। 


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