Wednesday, March 07, 2012

एक ही दरख़्त है इस सेहरा में


हम दोनों के दरमयाँ
एक गहरी तेज़ बहाव वाली
नदी बहती है
ये नदी ख़ाबख़ोर मगरमच्छों से भरी है
ये मगरमच्छ तुम्हारे मेरे ख़ौफ़ से पैदा हुये हैं


हम दोनों एक अजीब क़ैफ़ियत के शिकार हैं
हमने पाले हैं दो दुश्मन जज़्बात एक साथ
एक मुहब्बत दूसरा ख़ौफ़
इन दोनों के साथ जीना 
हम सीख भी नहीं पाये हैं
और जी भी रहे हैं


तुम्हारे उधर के मंज़र ख़ूबसूरत हैं
रुत मेरे इधर भी खराब नहीं है
पार तुम भी आना चाहते हो
पार मैं भी जाना चाहता हूँ


उफ़्फ़ ये क्यूँ नहीं होता
ख़ौफ़ मुहब्बत को खा जाता
या ख़ुद फना हो जाता उसकी तासीर से
ये किस हाल में जी रहें हैं हम दोनों


सच कहूँ, एक ही दरख़्त है इस सेहरा में
जिसकी छाँव में मैं नींद ले पाता हूँ,
वो ये कि इस तरफ़ से तुम उस किनारे पर
साफ़-साफ़ दिखाई देते हो.