Wednesday, November 30, 2011

यादों की सड़क - घर तक


ये तारों का एक गुच्छा
जो यहाँ की मुंडेर से दिखता है
वहाँ के आसमान में भी हू-ब-हू टिका है
उस के ठीक नीचे
रस्ते पर आँख लगाए खड़ा है
मेरी पैदाइश के पहले का
छत पर का कमरा मेरा

उस कमरे में सामान बहुत ज़्यादा नहीं है
एक पुलिंदा किताबें और एक बिस्तर है
कुछ काग़ज़ के पुर्ज़े और कुछ
टूटी फूटी नज़्मों की रूहें हैं
अधकचरे अफ़सानों की अजन्मी लाशें भी मिल जायेंगी 
जो अब इंतज़ार नहीं करतीं
ख़ुद में जान फूँके जाने का

एक क़लम ज़रूर होगी
मेरी उडीक की स्याही अपने में समेटे हुए ,
कमरे के हर कोने में
मेरी साँसों के निशान पसरे हैं
मेरे आँसुओं की भाप मौजूद है
उन्हीं की कीमियाई से ज़िन्दा रखे होगी
अपने भीतर के पानी को

अब भी उन दरीचों से छनकर आती होगी
गली में खेलते बच्चों की आवाज़ें
कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें
कभी कभार किसी गुज़रती मोटर की आवाज़
और पड़ोस के धोबी की
कपड़ों  को पछाड़ने की आवाज़
उड़ती पतंगों की सरसराहट
वो-कटा वो-मारा की आवाज़
पाँच दफ़े की अज़ान
और मंदिर के घंटों की आवाज़ 

तुम्हें पता है
मैं कहीं भी जाता हूँ थोडा ही जा पाता हूँ 
बहुत सारा तो वहीं रह जाता हूँ
कमरे में अपने

हर रात यहाँ के आसमान से कहता हूँ
वहाँ की छत से भी दिखता है
हू-ब-हू ऐसा ही एक तारों का गुच्छा ..!