"फ़लाँ साहब के लड़के ने तुम्हारी ही कॉलेज से engineering किया है, अब फ़लाँ कंपनी में काम कर रहा है, और "इतना" उसका पैकेज है.." , इस तरह के जुमलों के परबत अब इतने रगड़ खा चुके हैं के भारी बादलों को इस पार नहीं रोक पाते हैं, और पानी से भरे बादल आसानी से उन्हें लांघ लेते हैं। ग़ौरतलब है के ऐसे जुमले मेरे दादा और पिता के उस अरसे से तकिया क़लाम हैं जब से मैंने engineering से छुटकारा पाया है। अब तो हाल ये है के उनके मुँह से भी ये धीरे-धीरे उतरने लगे हैं, और वे अपनी कालजयी नीति को लगभग अधमरा मान चुके हैं जिसके तहत उनका कभी सोचना रहा होगा, "तब तक बेइज़्ज़त करो जब तक औलाद आपकी बात न मान ले..."
हालांकि हार मानने वालों में से वो नहीं है, बस नीति-परिवर्तन का दौर शुरू किया है। अब जा-ब-जा मेरी चुगलियाँ होती हैं, मेरी दिनचर्या भीषण आलोचना की शिकार है, तंज़-ओ-तानों के भयानक दौर शुरू हो गए हैं, और वो सभी क़वायदें की जा रही हैं कि किसी तरह तो मैं अपनी महा-मूर्खता को पहचानूँ और ज़िंदगी के तौर घर के रणविजयों के मुताबिक़ ढाल लूँ। ये तो वो है जो सामने कि दिखती बात है, अलावा इसके, कभी-कभार घर के दर-ओ-दीवारों को जो बातें करते मैंने सुना है वो इस तरह हैं, "26 का हो गया है, अब तक तो कोई जात-भाई पूछता तक नहीं है, न जाने कौन इसे लड़की देगा अपनी, कहीं ऐसा न हो के छोटे को पहले ब्याहना पड़े.."; और, "पता नहीं दिन भर घर में पड़े-पड़े क्या करता रहता है, दुकान पर कितना भी हमारा हाथ अड़ जाये, लेकिन ऐसा तो है ही नहीं के इसे बुला लिया जाये, दो काम करने जैसा भी नहीं है, होया-अनहोया है,..", और, "दिन भर जाने क्या किताबें पढ़ता रहता है, कॉलेज के दिनों में तो कभी पढ़ते हुए नहीं देखा, पढ़ाई की होती तो आज ये नौबत थोड़े आती.." और भी न जाने क्या क्या..कभी कभी मैं दीवारों को कह देता हूँ, के भई मुझे न बताया करो ये सब, अब कुछ ऐसा हो जो न-मालूम हो तो कहो भी, ये तो बहुत पुराना है...जैसे सदियों से ही चला आ रहा हो...
कभी-कभी मुझे ख़ाब भी देखिये कैसे आते हैं, कोई शेरवानी पहने साहिब, दिखने में नीम-अदीब से लगते हैं, माइक पर एक निहायत सलीकेदार जनता से मुखातिब हो मेरे नाम के साथ ऐलान कर रहे हैं के इनके फ़लाँ लेख के लिए इन्हें "इतने लाख" रुपयों इनाम से नवाज़ा जाता है, इस उम्मीद के साथ के ये हमेशा इसी तरह लिखते रहें,..वगैरह-वगैरह..सामने कि क़तारों की कुछ सीटों पर मैं मेरे परिवार वालों के साथ तशरीफ़ज़दा हूँ, और ऐलान के साथ ही स्टेज पे जाकर अपना इनाम जेब में रखता हूँ, और घर वालों का आशीर्वाद लेता हूँ। अब तो भाई सारे मुहल्ले में, मुहल्ले में क्या सारे शहर में चर्चा है, कहीं दादा के होनहार पोते का, कहीं बाप के क़ाबिल सपूत का..दादा बयान करते नहीं थक रहें हैं। "क्या कहें साहब आपको ! दिन भर किताबों में सिर धुनता रहता था, हमको भी कभी नहीं बताया के क्या कर रहा है, नौकरी नहीं की तो गालियाँ भी कम नहीं दी इसे, हम क्या समझते थे के ये तो हीरा है, देखो जी ! ये लिखने-विखने के भी इतने पैसे मिलते हैं कभी ? पर पोते का जवाब नहीं..." और....
ख़ैर ! सपना है , कुछ भी दिख जाता है...ऐसे सपनों के बाद मैं बहुत देर तक अपनी मुस्कान पे लाठी नहीं मार पाता हूँ। मगर सच ये है के मेरे किए गए इंतेख़ाबों से कोई खुश नहीं है। सभी सिर धुन रहें हैं के लायक हो तो एक ही बहुत..मेरा दमित बचपन अब तक गालियाँ देता है। और अब फ़ालतू सी उम्मीदों के पहाड़ मेरे कंधों पे लादे जा रहें हैं...मगर किसी तरह मैं "आबरू" बचाए बैठा हूँ। ज़ोर मार रहा हूँ वही करने के लिए जो मैं करना चाहता हूँ। मेरे परिवार वाले मुझसे होने वाले किसी ऐसे काम की अब सारी उम्मीदें छोड़ चुके हैं जिससे उन्हें मुझ पर गर्व हो। उनके मुताबिक़ ऐसी "क़लम घसीटू", नाकारा औलाद से उम्मीद ही क्या की जा सकती है.।
वैसे उनका मेरी तरफ़ से ना-उम्मीद होना एक तरह से अच्छा ही है...सोच को कौन पाबंद कर सकता है? ये ना-उम्मीदी मेरे लिए कुछ ऐसी है, जैसे हर नफ़स आज़ादी-आज़ादी..
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