हर एक-दो रोज़ बाद
मेरे घर आया करती है ख़ुशबू
ये एक अपाहिजों का घर है
यानि ! इसमें हम जो सब रहते हैं
अपाहिज हैं
ख़ुशबू के पास दो चीज़ें होती हैं
सींकों वाली झाङू और बेमोल तबस्सुम
झाङू इसलिए कि हम अपाहिज हैं
तबस्सुम इसलिए कि ठीक बात नहीं
अपाहिज को अपाहिज कहना..
10 मिनट में वो सब ठीक कर देती है
चाहे इंडियन हो या वेस्टर्न
क्या हुनर है !!
घर के सामने की नाली से
बहा ले जाती है हमारे जिस्मों का मैल
जिसके बारे में एक पुख़्तगी लेकर हम बाथरूम से निकलते हैं
कि छुड़ा लिया होगा।
ख़ुशबू इतनी ज़िंदा, कि चार इंच ऊपर से
फेंकी गयी दो रोटियों से निचोड़ लेती है
विटामिन्स मिनरल्स यू नो !! एवरीथिंग.
और हम अपाहिज इतने अपाहिज
कि उसे छू भी नहीं पाते हैं
ख़ुशबू जो पाँच-छह रोज़ न आ पाये हमारे यहाँ
तो घर के कुछ बेहद अहम हिस्से
सड़ांध मारने लगते हैं...