Wednesday, August 31, 2011

एक और ईद


फटे जेब की ईद है भाई फटे जेब की ईद

हँसते मेरे होंठ हैं भाई रोते मेरे दीद

तौफ़ीक़ ज़ब्त की छूट रही है क्यूँ आई है ईद

काला मेरा चाँद है भाई फीका है खुर्शीद...



Sunday, August 28, 2011

याद



दूरियाँ मंज़ूर तो नहीं होती लेकिन
दूर कर देते हैं मजबूर दौर

दिलों में फ़र्क़ नहीं हमारे लेकिन
दूर कर देते हैं ज़िंदगियों के फ़र्क़

ख्वाहिशें दम तोड़ देती हैं तेरी ओर आने की
क्यूँके ग़म और बहुत हैं

कभी कभी तेरे तसव्वुर से भागने की कोशिश भी करता हूँ
पर आँख गिरा देती है एक बूँद

ख़्वाबों में दौड़ता हूँ तेरे साए के पीछे
और थक कर गिर जाता हूँ 

और फिर रोज़ सहर एक दुआ में तुझे याद करता हूँ 
इस शुक्रगुज़ारी के साथ के तू कहीं तो है

पर सच ये है के मैं तुझे छूना चाहता हूँ.....

                                                                            हिमांशु

Friday, August 19, 2011

ग़ज़ल


अब तो ये हो के रास्ता मिल जाए कोई 
ख़ुदा न तो रहनुमा मिल जाए कोई

समंदर में भटकती कश्तियों को
ख़ुदा करे अब किनारा मिल जाए कोई 

बहुत तलाशी मुहब्बत इन शहरों में
अब तो ये हो के सेहरा मिल जाए कोई

ज़िन्दगी मुझे शिकायत तो नहीं तुझसे
पर बहुत हुआ क़ज़ा मिल जाए कोई


                                                                             हिमांशु

Friday, August 12, 2011

उदास दौर..

वो वक़्त अब रहा नहीं
जो कभी हुआ करता था


जब ज़िंदगी एक पतंग की उड़ान से आगे कुछ नहीं थी
जी चाहता था के खुले आसमान में उड़ जायें किसी परिंदे की तरह
जब दोस्त ज़िंदगी का सबसे बड़ा तौहफ़ा लगते थे
समंदर से बड़े ख़्वाब हुआ करते थे और इरादों में वज़न था
और ये ना मालूम था के डर क्या होता है.


वो तमन्नायें अब रही नहीं
जो कभी हुआ करती थीं


जिनमें किसी नाज़नीं के होठों की सुर्खियों में खो जाने को जी चाहता था
किसी ज़ुल्फ़ की लटक पर दिल पे जैसे खंजर चलता था, और मिट जाने को जी चाहता था
और जी चाहता था के जहाँ खाली हो जाये तदबीरों से, रोज़गारों से, और तो और इंसानों से
और सिर्फ़ मैं रहूँ और रहे वो;


वो ख़्वाब अब रहे नहीं
वो हसरतें अब रही नहीं
वो जुनून अब रहा नहीं 


अब तो आलम ये है के जान सहम सी गयी है
ज़रा सा दिल है जो दबा जाता है मजबूरियों की चट्टान तले
रौशनियाँ डराती हैं अब अँधेरों से ज़्यादा
ख़ुदा दिल से निकल लबों पे आ गया है
नींद ज़ीस्त की दुश्मन हो गयी है और ख़्वाबों की तस्वीरें बदल चुकी हैं
भागे जाते हैं किसी अनचाही ना-आशना मंज़िल के सिम्त 
और किसी ख़लिश से परेशान दिल कहता है के मर क्यूँ नहीं जाते...

                                                                                                   
                                                                                       हिमांशु सोनी

Tuesday, August 09, 2011

मैं कौन हूँ..


मेरे होने से तो कुछ ख़ास फ़र्क़ नहीं
न होने से भी कुछ बदलता नहीं
फिर मेरा होना क्या है, क्यों है
जब मैं खुद नहीं जानता तो क्यों
हर वक़्त मुझीसे पूछा जाता है
के तुम कौन हो.

मैंने नहीं चुना था मेरा पैदा होना
किसी क़ुसूर का मेरे हाथों होना भी मुझे याद नहीं आता
के जिसकी सज़ा में जीना सुनाया गया हो
मेरे शौक के खिलाफ़ की पैदाइश के बाद
मुहर थापी गयी किसी मज़हब की मेरे माथे पर
और सिखायी गयी नफ़रतें दूसरे मज़हबों के लिए
कोशिशें की गयी मेरे ज़ेहन को ग़ुलाम बनाने की
ताकि मैं वैसे न सोच सकूँ
जैसे मैं सोचना चाहता हूँ

मुझको बनाया चितकबरी चमड़ियों में
और लड़ने के लिए छोड़ दिया
मेरे हाथों उसूल बनवाए गए
फिर मेरे ही हाथों तुड़वाये गए
मेरे रोने को बुज़दिली और
और मेरे पलटवार को पौरुष कहा गया
और लाशों के ढेर पे बने महलों को
तहज़ीब कहा गया

ये तो मैं था के कभी कभी
चुरा लेता था अपने आप को
दोस्ती और मोहब्बत के आग़ाज़ 
मैं ही लाया था
लेकिन ये सब बड़े घाव पर 
छोटे मलहम जैसा था 
मेरी तमाम कोशिशें शिकार हो गयी
उस साज़िश की जो अज़ल से की जा रही है

गर तू फिर भी ख़ुदा है
तो मुझे हक़ दे सवाल पूछने का
बता के मैं कौन हूँ....

                                                                                 हिमांशु सोनी 
कहूँ किससे मैं के क्या है शब ए ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता....

                                                              - मिर्ज़ा ग़ालिब