Thursday, September 22, 2011

सलोनी





नफ़ीस लबों और फ़रोज़ाँ आरिज़ों को देख लगता था
कि सारे आलम में ज़मीन ढूंढते धूप के रक़्स
आख़िरकार पनाह पा गए हों उसके चेहरे पर
एक ही चेहरे से कह दी गयी थी ग़ज़लें
उदासी और खुशमिज़ाजी की
एक ही चेहरे के वरक़ पर लिखी थीं
इबारतें ग़मे-फ़िराक़ और सुकूने-विसाल की
वो कुछ तलाशती थी या नापती थी दूरियाँ
ख़ुद से उसकी जिसकी कि उसे तलाश रही होगी

मुझसे उसे कुछ ऐसी उम्मीद थी
कि हँसते मौसमों में समझ जाऊँ ख़िज़ाँ की आहट
देख लूँ उन पानी के से धब्बों को
जो उसके रुख़सारों के गड्ढों में छुपे हैं
उसकी हँसी में भी उलझन थी
उसके ग़म समझना भी मुश्किल था

मैं शायद कुछ मुक़र्रर कह पाता उसके बारे में
काश ! उसकी आँखें भी देख पाता....

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