दूरियाँ मंज़ूर तो नहीं होती लेकिन
दूर कर देते हैं मजबूर दौर
दिलों में फ़र्क़ नहीं हमारे लेकिन
दूर कर देते हैं ज़िंदगियों के फ़र्क़
ख्वाहिशें दम तोड़ देती हैं तेरी ओर आने की
क्यूँके ग़म और बहुत हैं
कभी कभी तेरे तसव्वुर से भागने की कोशिश भी करता हूँ
पर आँख गिरा देती है एक बूँद
ख़्वाबों में दौड़ता हूँ तेरे सा ए के पीछे
और थक कर गिर जाता हूँ
और फिर रोज़ सहर एक दुआ में तु झे याद करता हूँ
इस शुक्रगुज़ारी के साथ के तू कहीं तो है
पर सच ये है के मैं तुझे छूना चाहता हूँ.....
हिमांशु
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