Friday, August 12, 2011

उदास दौर..

वो वक़्त अब रहा नहीं
जो कभी हुआ करता था


जब ज़िंदगी एक पतंग की उड़ान से आगे कुछ नहीं थी
जी चाहता था के खुले आसमान में उड़ जायें किसी परिंदे की तरह
जब दोस्त ज़िंदगी का सबसे बड़ा तौहफ़ा लगते थे
समंदर से बड़े ख़्वाब हुआ करते थे और इरादों में वज़न था
और ये ना मालूम था के डर क्या होता है.


वो तमन्नायें अब रही नहीं
जो कभी हुआ करती थीं


जिनमें किसी नाज़नीं के होठों की सुर्खियों में खो जाने को जी चाहता था
किसी ज़ुल्फ़ की लटक पर दिल पे जैसे खंजर चलता था, और मिट जाने को जी चाहता था
और जी चाहता था के जहाँ खाली हो जाये तदबीरों से, रोज़गारों से, और तो और इंसानों से
और सिर्फ़ मैं रहूँ और रहे वो;


वो ख़्वाब अब रहे नहीं
वो हसरतें अब रही नहीं
वो जुनून अब रहा नहीं 


अब तो आलम ये है के जान सहम सी गयी है
ज़रा सा दिल है जो दबा जाता है मजबूरियों की चट्टान तले
रौशनियाँ डराती हैं अब अँधेरों से ज़्यादा
ख़ुदा दिल से निकल लबों पे आ गया है
नींद ज़ीस्त की दुश्मन हो गयी है और ख़्वाबों की तस्वीरें बदल चुकी हैं
भागे जाते हैं किसी अनचाही ना-आशना मंज़िल के सिम्त 
और किसी ख़लिश से परेशान दिल कहता है के मर क्यूँ नहीं जाते...

                                                                                                   
                                                                                       हिमांशु सोनी

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